हमारे धर्मग्रंथों में सृष्टि की उत्पत्ति के अनेक वर्णन मिलते हैं, पर ऋग्वेद के दसवें मंडल में एक ऐसा सूक्त है जो उत्तर देने के बजाय प्रश्न पूछता है — और अंत में ईमानदारी से स्वीकार करता है कि शायद उत्तर किसी के पास नहीं। यही नासदीय सूक्त (ऋग्वेद 10.129) है, जिसे विद्वान वैदिक साहित्य का सबसे दार्शनिक और सबसे साहसिक पाठ मानते हैं। आइए, इस सूक्त की हर पंक्ति के साथ चलें और देखें कि हज़ारों वर्ष पहले एक ऋषि ने ऐसे प्रश्न कैसे उठाए, जो आज के वैज्ञानिक भी पूछ रहे हैं।
AI Illustrationनासदीय सूक्त क्या है?
नासदीय सूक्त ऋग्वेद के दसवें मंडल (मंडल 10) का 129वां सूक्त है, जिसमें कुल सात ऋचाएँ (मंत्र) हैं। इसका नाम उसके पहले शब्द से पड़ा है — “नासदासीत्”, यानी “नहीं था” (न + असत् = जो नहीं था)। अंग्रेज़ी में इसे “The Hymn of Creation” (सृष्टि का गीत) कहा जाता है।
यह सूक्त इसलिए अनोखा है क्योंकि वेदों के अधिकांश सूक्त देवताओं की स्तुति में हैं — अग्नि, इंद्र, सूर्य की महिमा में। पर यह सूक्त किसी देवता की स्तुति नहीं करता। यह तो मानो एक ऋषि का एकांत चिंतन है, जो ब्रह्मांड के सबसे बड़े प्रश्न पर मनन करता है: यह सब शुरू हुआ कैसे? विश्व के अनेक विद्वानों ने इसे वैदिक साहित्य का सबसे गहरा दार्शनिक पाठ माना है, और आधुनिक युग में भी यह दार्शनिकों, वैज्ञानिकों और कवियों को समान रूप से आकर्षित करता रहा है।
सबसे बड़ी बात — यह सूक्त किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता। यह प्रश्नों से शुरू होता है और प्रश्नों पर ही समाप्त होता है। यही इसकी असली विशेषता है, और यही इसे चार हज़ार वर्ष बाद भी उतना ही ताज़ा रखता है।
AI Illustrationसूक्त की यात्रा: अंधकार से प्रश्न तक
नासदीय सूक्त को समझने का सबसे अच्छा तरीका है उसके साथ ऋचा-दर-ऋचा चलना। हर ऋचा एक नया द्वार खोलती है।
पहला प्रश्न: तब क्या था?
सूक्त की पहली ऋचा ही हमें परिचित दुनिया से बाहर ले जाती है:
नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्।
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम्॥
सरल अर्थ: “उस समय न ‘असत्’ (अभाव) था, न ‘सत्’ (भाव)। न वायु थी, न उसके पार का आकाश। क्या था वह, जो सबको ढके हुए था? कहाँ था? किसकी शरण में? क्या उस समय गहन और गंभीर जल था?”
ध्यान दीजिए — ऋषि यह नहीं कहते कि “पहले यह था”। वे कहते हैं कि न तो अस्तित्व था, न अभाव। यानी सृष्टि से पहले की स्थिति हमारी सोच की दोनों श्रेणियों — होना और न होना — से परे है। दूसरी ऋचा इसे और गहरा करती है:
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः।
आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किञ्चनास॥
सरल अर्थ: “तब न मृत्यु थी, न अमरता। न दिन और रात का कोई संकेत था। वह ‘एक’ बिना वायु के, अपनी ही शक्ति (स्वधा) से श्वास ले रहा था। उसके सिवा और कुछ भी नहीं था।”
यहाँ पहली बार “तदेकम्” (वह एक) शब्द आता है — एक ऐसी सत्ता जो स्वयं से पूर्ण है, जिसे साँस लेने के लिए वायु की भी आवश्यकता नहीं। यही अद्वैत (non-duality) का बीज है, जिसे बाद में उपनिषदों ने पूर्ण रूप से विकसित किया।
तपस से जन्मा ‘एक’
तीसरी ऋचा में सृष्टि का पहला संकेत मिलता है:
तम आसीत्तमसा गूहळमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम्॥
सरल अर्थ: “आरंभ में अंधकार ही अंधकार में छिपा था। सब कुछ अप्रकाशित जल था। जो कुछ भी था, शून्य से ढका हुआ था। तब तपस की महिमा से वह ‘एक’ जन्मा।”
यहाँ “तपस” शब्द आया है — और यही इस सूक्त का सबसे रहस्यमय शब्द है। विद्वानों का एक वर्ग इसे ब्रह्मांडीय ऊष्मा या ऊर्जा मानता है, तो दूसरा इसे गहन साधना-शक्ति। दोनों दृष्टियों में एक बात समान है: सृष्टि कोई यांत्रिक घटना नहीं, बल्कि एक गहन ऊर्जा-प्रक्रिया है। दिलचस्प बात यह है कि बाद में योग और वेदांत की परंपरा में तपस का अर्थ ही साधना और आत्म-शक्ति हो गया — मानो सृष्टि और साधना एक ही स्रोत से निकले हों।
काम — सृष्टि का पहला बीज
चौथी ऋचा शायद पूरे सूक्त की सबसे सुंदर ऋचा है:
कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्।
सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा॥
सरल अर्थ: “तब आरंभ में काम (इच्छा) प्रकट हुआ — जो मन का पहला बीज था। हृदय में खोज करते हुए ऋषियों (कवियों) ने सत् और असत् के बीच का संबंध खोज लिया।”
यह एक क्रांतिकारी कल्पना है: ब्रह्मांड की शुरुआत किसी आज्ञा से नहीं, बल्कि इच्छा से होती है। सृष्टि से पहले भी कुछ “चाह” थी — और वही चाह मन का पहला बीज बनी। यह विचार बाद में उपनिषदों में भी गूंजता है, और आधुनिक मनोविज्ञान तक में इसकी झलक मिलती है — कि हर सृजन, चाहे वह किसी कलाकार का हो या किसी माँ का, इच्छा से ही शुरू होता है।
देवता भी बाद में आए
छठी ऋचा में सूक्त अपने सबसे साहसिक बिंदु पर पहुँचता है:
को अद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः।
अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव॥
सरल अर्थ: “कौन सचमुच जानता है? यहाँ कौन कह सकता है कि यह सृष्टि कहाँ से जन्मी? देवता तो इस सृष्टि के बाद आए — तो फिर कौन जाने कि यह कहाँ से आई?”
यह पंक्ति उस ग्रंथ में लिखी गई है जो देवताओं की स्तुतियों से भरा है! ऋषि कहते हैं — देवता स्वयं इस सृष्टि के भीतर हैं, वे इसके बाद आए, इसलिए वे भी इसके आरंभ के साक्षी नहीं हो सकते। यानी सृष्टि का मूल कारण देवताओं से भी परे है। यह वैदिक परंपरा की गहरी उदारता दिखाता है — यहाँ प्रश्न पूछने की कोई मनाही नहीं, बल्कि प्रश्न ही साधना है।
अंतिम पंक्ति: ‘या शायद वह भी नहीं जानता’
सूक्त की अंतिम ऋचा विश्व के धार्मिक साहित्य में अपनी तरह की अकेली है:
इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद॥
सरल अर्थ: “यह सृष्टि जिससे उत्पन्न हुई — चाहे उसने इसे रचा हो, चाहे नहीं — जो इसका अधिष्ठाता परम आकाश में है, वही जानता है — या शायद वह भी नहीं जानता।”
कल्पना कीजिए — एक धार्मिक ग्रंथ की पंक्ति जो कहती है कि “शायद ईश्वर भी नहीं जानता”। यह नास्तिकता नहीं है; यह ज्ञान की विनम्रता है। ऋषि यह नहीं कहते कि ईश्वर नहीं है। वे कहते हैं कि सत्य इतना विराट है कि उसे शब्दों में बाँधना संभव नहीं — और जो यह दावा करे कि वह पूरा सत्य जानता है, वह स्वयं को धोखा देता है। यही नासदीय सूक्त की आत्मा है: ईमानदार प्रश्न, अहंकार-रहित खोज।
AI Illustrationयह सूक्त अन्य सृष्टि-वर्णनों से कैसे अलग है?
वैदिक साहित्य में सृष्टि के और भी प्रसिद्ध वर्णन हैं, और उनसे तुलना करने पर नासदीय सूक्त की विशिष्टता और साफ़ दिखती है। पुरुष सूक्त (ऋग्वेद 10.90) में सृष्टि विराट पुरुष के यज्ञ से होती है — उनके अंगों से ही ब्रह्मांड के अंग बनते हैं। हिरण्यगर्भ सूक्त (ऋग्वेद 10.121) में सृष्टि का आरंभ स्वर्णिम अंडे (हिरण्यगर्भ) से माना गया है। बाद में ऐतरेय उपनिषद कहता है कि “आरंभ में केवल आत्मा ही था” — और उसने अकेलेपन से सृष्टि की इच्छा की।
इन सबमें एक बात समान है — वे एक निश्चित उत्तर देते हैं। नासदीय सूक्त अकेला ऐसा पाठ है जो उत्तर देने से इनकार करता है और प्रश्न को ही खुला छोड़ देता है। यह कोई कमी नहीं, बल्कि एक गहरी दार्शनिक स्थिति है: कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका उत्तर देने की कोशिश करना ही उन्हें छोटा करना है।
यह हमें सनातन परंपरा की एक बड़ी विशेषता दिखाता है — बहुलता (plurality)। एक ही ग्रंथ में सृष्टि के कई वर्णन हैं, और उनमें से एक प्रश्नवाचक चिह्न है। यानी परंपरा में अलग-अलग दृष्टियों के लिए जगह थी — यह कोई एकरूप (monolithic) व्यवस्था नहीं थी, बल्कि एक जीवंत संवाद था।
विज्ञान की भाषा में नासदीय सूक्त
आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान (cosmology) ने पिछली सदी में जो प्रश्न पूछे, वे अचंभित करने वाले ढंग से नासदीय सूक्त के प्रश्नों से मिलते हैं। बिग बैंग सिद्धांत कहता है कि ब्रह्मांड एक अत्यंत सघन बिंदु से फैलना शुरू हुआ — पर उस “पहले” क्या था, यह विज्ञान नहीं बता सकता, क्योंकि समय और स्थान स्वयं उसी क्षण से शुरू हुए। भौतिक विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग ने लगभग इसी भाव से कहा था कि “बिग बैंग से पहले क्या था” पूछना वैसा ही है जैसे उत्तरी ध्रुव के उत्तर में क्या है, यह पूछना — प्रश्न ही अर्थहीन है। नासदीय सूक्त की पहली ऋचा भी यही कहती है — वहाँ न सत् था, न असत्, न दिन, न रात।
इसी तरह, आधुनिक भौतिकी में “क्वांटम शून्य” (quantum vacuum) की अवधारणा है — एक ऐसा “कुछ नहीं” जो वास्तव में ऊर्जा से भरा है। सूक्त का “तुच्छ्येनाभ्वपिहितम्” (शून्य से ढका हुआ) मानो इसी का काव्यात्मक पूर्वाभास है। यह कहना गलत होगा कि ऋषि आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान जानते थे — वे तो कवि और दार्शनिक थे, वैज्ञानिक नहीं। पर यह कहना उचित है कि उनके प्रश्न और आधुनिक विज्ञान के प्रश्न एक ही गहराई पर मिलते हैं: दोनों स्वीकार करते हैं कि सृष्टि के आरंभ में हमारी सामान्य समझ काम नहीं करती।
सबसे महत्वपूर्ण समानता यह है — वैज्ञानिक पद्धति की बुनियाद ही विनम्रता है: “मैं जो जानता हूँ, वह सत्य का एक छोटा सा हिस्सा है।” नासदीय सूक्त चार हज़ार वर्ष पहले यही सिखा रहा था। यही कारण है कि आज भी वैज्ञानिक, दार्शनिक और कवि इस सूक्त को उद्धृत करते हैं।
AI Illustrationआज के जीवन के लिए संदेश
नासदीय सूक्त सिर्फ एक प्राचीन दार्शनिक पाठ नहीं — यह आज के हमारे जीवन के लिए भी गहरे संदेश रखता है।
पहला संदेश है — “मैं नहीं जानता” कहने का साहस। आज की दुनिया में हर कोई हर चीज़ का उत्तर जानने का दिखावा करता है। सोशल मीडिया पर हर विषय पर निश्चित राय है। ऐसे युग में नासदीय सूक्त हमें याद दिलाता है कि सच्ची बुद्धिमत्ता यह जानने में है कि हम क्या नहीं जानते। जीवन के सबसे बड़े प्रश्नों — मृत्यु के बाद क्या है, ईश्वर कैसा है, यह सब क्यों है — के सामने ईमानदार मौन, झूठे दावों से कहीं अधिक सच्चा है।
दूसरा संदेश है — श्रद्धा और प्रश्न शत्रु नहीं हैं। कई लोग सोचते हैं कि आस्था का अर्थ है बिना प्रश्न किए मान लेना। नासदीय सूक्त इसके ठीक विपरीत है — यह एक धार्मिक ग्रंथ है जो प्रश्न को ही साधना बनाता है। यहाँ संदेह कमज़ोरी नहीं, खोज की शुरुआत है। जो सच्चे मन से खोजता है, वही सच्चा श्रद्धालु है — यही इस सूक्त की शिक्षा है।
तीसरा संदेश है — विस्मय (wonder) की भावना को जीवित रखना। बच्चे जब पहली बार तारे देखते हैं, तो उनकी आँखों में विस्मय होता है। बड़े होते-होते हम यह विस्मय खो देते हैं, क्योंकि हमें लगता है कि सब कुछ समझ लिया है। नासदीय सूक्त हमें वह बचपन का विस्मय लौटाता है — यह कहता है कि ब्रह्मांड अब भी उतना ही रहस्यमय है जितना पहले था, और यह रहस्य ही जीवन को गहराई देता है।
और चौथा संदेश है — उत्तर न मिले तो भी खोज जारी रखना। सूक्त का ऋषि अंतिम पंक्ति में स्वीकार करता है कि शायद कोई नहीं जानता — पर इससे पहले उसने सात ऋचाओं में गहरे प्रश्न पूछे। यानी उत्तर की गारंटी न होने पर भी प्रश्न पूछना सार्थक है। जीवन में भी — हम हर काम इसलिए नहीं करते कि उसका निश्चित फल मिलेगा, बल्कि इसलिए करते हैं कि वह काम अपने आप में सार्थक है। यही निष्काम कर्म (selfless action) की भावना है, जिसे गीता ने बाद में पूर्ण रूप से विकसित किया।
निष्कर्ष
नासदीय सूक्त संदेह का गीत नहीं, बल्कि गहरी श्रद्धा का गीत है — श्रद्धा प्रश्न पूछने की, श्रद्धा सत्य की विराटता में, और श्रद्धा उस विनम्रता में जो कहती है कि “मैं पूरा नहीं जानता, पर खोजता रहूँगा”। यह सूक्त हमें सिखाता है कि सनातन परंपरा में अंधविश्वास के लिए जगह नहीं, पर अंध प्रश्नों के लिए भी जगह नहीं — केवल ईमानदार खोज के लिए जगह है।
यह पिलर लेख उन गहरे विषयों का प्रवेश-द्वार है, जिन पर हम आगे विस्तार से लिखेंगे — पुरुष सूक्त और सृष्टि का यज्ञ-दर्शन, हिरण्यगर्भ की कल्पना, उपनिषदों का अद्वैत दर्शन, और वेदों में वैज्ञानिक चेतना। अगली बार जब आप रात में तारों को देखें, तो याद कीजिए — हज़ारों वर्ष पहले एक ऋषि ने भी यही देखा था, और पूछा था: “कौन जानता है?” शायद यही प्रश्न हमारी सबसे बड़ी धरोहर है।